विजय कुमार नाकाम

~ ~ परिचय ~ ~

॥ दर्द के साज़ पर हम मधुर गीत गातें हैं ॥

नाम : विजय कुमार नागर

तखल्लुस : '' नाकाम '’

जन्मतिथि : 07-07-1946,

जन्मस्थान : लाहोर (ब्रिट्रिश भारत)

पिता : स्व. कुंदनलाल नागर

माता : स्व. सीता देवी नागर

पत्नी : श्रीमति हेमांशु नागर

पुत्री : श्रीमति कल्पा नागर, मुंबई , भारत ।

: सुश्री पूजा नागर, ह्यूस्टन,संयुक्त राज्य अमेरिका ।

शिक्षा : Diploma in Mechanical Engineering, Bhavnagar

: Bachelor of Computer Applications, Udaipur

: Certification Course in Urdu from Jamia Milia Islamia ,

New Delhi ।

भागीदारी : मुशायरा , कवि सम्मेलन , अन्य गोष्ठियों में भाग लेना ।

प्रकाशन : कविता संग्रह ‘ जज्बात की उड़ान ‘ एवं अन्य पत्र पत्रिकाएँ ।

संबद्धता : युगधारा साहित्यिक संस्थान, उदयपुर

: गुजराती साहित्य सरिता, ह्यूस्टन, टेक्सस, संयुक्त राज्य अमेरिका ।

: राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर ।

: युगधारा साहित्यिक मंच, उदयपुर

: कला श्रुंखला सृजन मंच, उदयपुर

: काव्य संगम, उदयपुर

: राज राजेश्वरी संस्थान, उदयपुर

: तनिमा पत्रिका, उदयपुर

व्यवसाय : सेवानिवृत - स्वयं के टाइपराइटर सेल्स सर्विस के व्यवसाय से

रुचि : हिन्दी-उर्दू एवं गुजराती भाषा में शायरी, कविता लिखना।

निवास : उदयपुर, राजस्थान, भारत ।

फोन : +91 98293 61402

ई-मेल : vijay7746@gmail.com

: authorvijaykumarnakam@gmail.com

Youtube : book launch function

: Gujarati Sahitya Sarita meeting

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सब्र कर ‘नाकाम’ गमे शब का है आखरी प्रहर

हर दम अश्क बहाने से नहीं तक़दीर बदल जाती ।

वो तड़प पैदा कर मेरी कोशिश में यारब

सूखे होठो पे हँसी कामयाबी की नहीं आ जाती । ।

-: समीक्षा :-

मेरे मतानुसार किसी बातको कम शब्दोमें लयात्मक एवं भावनात्मक ढंगसे पेश करना ही कविता है। कवि ने ईसका खूब अच्छी तरह से निर्वाह किया है। कविता संग्रह की सबसे बडी खूबी इसकी सरल भाषा है। मुझे आशा है कि आम आदमी भी इसका रसपान कर सकेगा।

जीवन के रास्तो से गुजरते हुए जो कवि को खट्टे मीठे अनुभव हुए, उन्ही को कवि ने कविता में पेश किया है। कहीं कहीं पीडा की अधिकता है। कि पढते पढते मन उदास हो उठता है।

मेरे मित्र विजय कुमार ‘नाकाम‘ की कविता यात्रा काफी रोचक और गमगीन है। कवि की मुख्य कविता ‘अजन्मी की पीडा‘ भ्रूणहत्या जैसे सर्वाधिक चर्चित विश्वव्यापी सामाजिक विषय पर है। समाज में इसके बारे में क्षणिक विरोध और चर्चा तो खूब होती है। मगर इस दिशा मैं कोई ठोस कदम समाज या प्रशासन द्वारा कभी नही उठाए जाते। यह कविता में हमारे पुरूष सत्तात्मक समाज की असली तस्वीर दिखाई गई है।

दूसरी कविता जो मुझे पसंद आई वो ‘ सूना कपाल‘ है। अिसमें कवि ने बडी सूक्ष्मता से विधवा जीवन का चित्रण किया है।

लंबी कविता ‘ नेटीजन नामा ‘काफी रोचक और थोडी हल्की फुल्की है। इसका अंत बडा ही अनोखा है।

शेर भी अच्छे लिखे गए हैं कई तो एैसे हैं कि जिन्हें पढकर लगता है कि कवि की रचनाओ पर मध्यकालीन सूफी शायरो के कलाम का बहुत ज्यादा प्रभाव है। मिसाल के तौर पर यह शेर पेश है।

बदर किया शेखने मस्जिदसे मुझ काफिरको

पुजारीने किया बाहर दे नास्तिक का खिताब

बेजार होकर फिरकापरस्तीसे जमानेकी

तकिया मैंने बना लिया है दिलदारके कूचेमें

विजय कुमार ‘नाकाम‘ को मेरी हार्दिक बधाई। उनके मंगल भविष्य की कामना करता हूं।

हरमन चौहान,

साहित्यकार

उदयपुर

'' जज़्बात की उड़ान '' का गुजराती साहित्य सरिता ह्यूस्टन, टेक्सास, सयुंक्त राज्य अमरीका में पुस्तक विमोचन समारोह ।